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सावधान! क्या आपका दूध सुरक्षित है? हर तीसरा सैंपल जांच में फेल, नामी ब्रांड्स के दूध में मिला जहर

बिहार,(FSSAI)

सुबह की चाय हो या बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एक गिलास दूध, जिस सफ़ेद अमृत पर आप भरोसा कर रहे हैं, वह दरअसल एक धीमा ज़हर हो सकता है। हाल ही में ‘ट्रस्टीफाइड’ (एक स्वतंत्र लैब टेस्टिंग प्रोग्राम) की चौंकाने वाली रिपोर्ट और एफएसएसएआई (FSSAI) के आंकड़ों ने देश के डेयरी उद्योग में मचे हड़कंप को उजागर कर दिया है। जांच में सामने आया है कि बाज़ार में बिकने वाले टॉप डेयरी ब्रांड्स भी गुणवत्ता के मानकों पर बुरी तरह विफल रहे हैं।

बैक्टीरिया का खौफ: तय सीमा से 98 गुना ज्यादा गंदगी
ट्रस्टीफाइड की जांच में पाया गया कि कुछ नामी ब्रांड्स के दूध के पाउच में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर FSSAI द्वारा निर्धारित सीमा से 98 गुना अधिक था। इसके अलावा, ‘टोटल प्लेट काउंट’ (TPC) भी सुरक्षित स्तर से कहीं ज्यादा पाया गया। यह सीधे तौर पर दूध के प्रसंस्करण (Processing) और पैकेजिंग के दौरान बरती गई भारी लापरवाही और अस्वच्छता को दर्शाता है, जो पेट की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

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भारत: दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, पर मिलावट में भी आगे
भारत वैश्विक दूध उत्पादन में 25% हिस्सेदारी के साथ दुनिया का नंबर-1 उत्पादक देश है। लेकिन विडंबना यह है कि गुणवत्ता के मामले में स्थिति बेहद चिंताजनक है।

2025 के आंकड़े: FSSAI की जांच में लगभग 38% नमूने मिलावटी पाए गए।

बढ़ता ग्राफ: 2015 से 2018 के बीच मिलावट के मामलों में 16.64% की वृद्धि हुई, जबकि 2022 में लिए गए नमूनों में से आधे फेल हो गए।

उत्तर भारत में मिलावट का ‘गढ़’
मिल्क सर्विलांस रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर भारत में दूध की शुद्धता सबसे कम है। यहाँ अनपाश्चुराइज्ड दूध के 47% नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसकी तुलना में दक्षिण भारत (18%), पश्चिम भारत (23%) और पूर्वी भारत (13%) की स्थिति थोड़ी बेहतर है।

दूध नहीं, केमिकल का घोल!
‘इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन’ की एक हालिया रिसर्च के अनुसार, जांचे गए 330 दूध के सैंपलों में से 70.6% दूषित पाए गए, जिनमें न केवल पानी (193 नमूने) की मिलावट थी, बल्कि दूध को झागदार बनाने के लिए 23.9% नमूनों में डिटर्जेंट और सफेदी व गाढ़ापन देने के लिए 9.1% नमूनों में यूरिया जैसे घातक रसायन भी मौजूद थे। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये रसायन किडनी फेलियर, लिवर की समस्याओं और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि उपभोक्ता केवल ‘ब्रांड नेम’ के भरोसे रहने के बजाय अपनी सेहत के प्रति जागरूक बनें।

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