
बिहार विधानसभा में आरक्षण को लेकर चल रही राजनीतिक हलचल ने एक बार फिर इस गंभीर विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आरजेडी की 85% आरक्षण की मांग और पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बीच, आइए समझते हैं कि वर्तमान में बिहार में आरक्षण का गणित क्या है और आगे की राह क्या हो सकती है।
क्या है पेच?
नवंबर 2023 में बिहार सरकार ने जातीय जनगणना के आधार पर आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 65% कर दिया था। इसमें 10% EWS (आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग) को जोड़ दें, तो कुल आरक्षण 75% पहुँच गया था। लेकिन, पटना हाईकोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी। फिलहाल राज्य में आरक्षण की सीमा वापस 50% (EWS को छोड़कर) पर आ गई है। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण बढ़ाने का फैसला ठोस आंकड़ों के बजाय सिर्फ आबादी के अनुपात पर आधारित था, जो सुप्रीम कोर्ट के 50% की सीमा (इंदिरा साहनी केस) का उल्लंघन है।
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आरक्षण का मौजूदा बंटवारा;
अगर 65% की बढ़ोतरी लागू होती, तो कोटा इस प्रकार होता, लेकिन फिलहाल मामला कोर्ट में है:-
वर्ग पुराना कोटा (%) प्रस्तावित कोटा (%)
अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) 18% 25%
पिछड़ा वर्ग (BC) 12% 18%
अनुसूचित जाति (SC) 16% 20%
अनुसूचित जनजाति (ST) 1% 2%
कुल (EWS के बिना) 47% 65%
क्या आरक्षण की सीमा बढ़ाई जा सकती है?
आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाने के लिए सरकार के पास मुख्य रूप से दो रास्ते बचते हैं:
नौवीं अनुसूची (9th Schedule): बिहार सरकार लगातार केंद्र से मांग कर रही है कि इस आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाए। अगर ऐसा होता है, तो इसे अदालत में चुनौती देना बेहद मुश्किल हो जाता है (जैसा तमिलनाडु के मामले में हुआ है)।
सुप्रीम कोर्ट में अपील: बिहार सरकार ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। यदि राज्य सरकार यह साबित कर दे कि पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व नौकरियों और शिक्षा में उनकी आबादी के मुकाबले “बेहद कम” है, तो सुप्रीम कोर्ट विशेष परिस्थितियों में ढील दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का ‘50% फॉर्मूला’ क्या है?
1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए, ताकि मेरिट और समानता का अधिकार प्रभावित न हो। केवल “असाधारण परिस्थितियों” में ही इस सीमा को पार किया जा सकता है, जिसके लिए सरकार को ठोस डेटा पेश करना होगा। बाद में 10% EWS आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी, क्योंकि यह आर्थिक आधार पर था और 50% की सीमा केवल जातिगत आरक्षण के लिए मानी गई थी।
