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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब हर स्कूल में फ्री मिलेंगे पैड, छात्राओं के लिए अलग टॉयलेट अनिवार्य

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (30 जनवरी 2026) को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए घोषणा की कि मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और निजता के अधिकार का अभिन्न अंग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान उचित सुविधाएं न मिलना उनकी गरिमा, समानता (अनुच्छेद 14) और शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A) का उल्लंघन है।

बता दें कि यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर आया है, जिसमें केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने की मांग की गई थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि सुविधाओं की कमी से कई लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पातीं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है और ड्रॉपआउट बढ़ता है।

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प्रमुख निर्देश और आदेश;
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश दिए हैं:-
1) फ्री बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड: सभी सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 6 से 12 तक की लड़कियों को मुफ्त में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन (ASTM D-694 स्टैंडर्ड के अनुरूप) उपलब्ध कराए जाएं। ये पैड टॉयलेट परिसर में या वेंडिंग मशीनों के माध्यम से आसानी से मिलने चाहिए।
2) अलग-अलग टॉयलेट अनिवार्य: लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग, कार्यात्मक (functional) शौचालय होने चाहिए, जिनमें पानी, साबुन और हैंडवॉशिंग की सुविधा हो। नए स्कूलों में निर्माण से ही प्राइवेसी और दिव्यांग-अनुकूल (disability-friendly) डिजाइन सुनिश्चित किया जाए।
3) मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट सिस्टम: स्कूलों में स्पेयर यूनिफॉर्म, इमरजेंसी सामग्री और सुरक्षित डिस्पोजल व्यवस्था होनी चाहिए। MHM (Menstrual Hygiene Management) कॉर्नर स्थापित किए जाएं।
4) निजी स्कूलों पर सख्ती: यदि कोई निजी स्कूल इन सुविधाओं को प्रदान करने में असफल रहता है, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है।
5) जवाबदेही: सरकारें इन निर्देशों को लागू न करने पर सीधे जवाबदेह होंगी। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ कानूनी आदेश नहीं, बल्कि उन लाखों लड़कियों के लिए है जो पीरियड्स के कारण स्कूल छोड़ देती हैं या मदद मांगने में शर्माती हैं।

फैसले का महत्व;
कोर्ट ने जोर दिया कि मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, न कि कोई बोझ या शर्म की बात। सुविधाओं की कमी से लड़कियों की गरिमा और निजता प्रभावित होती है, जिससे वे पढ़ाई में बराबरी से भाग नहीं ले पातीं। यह फैसला समाज के सबसे कमजोर वर्ग की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और शिक्षा में लिंग-आधारित असमानता को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम है। दरअसल, यह आदेश उन माता-पिता, शिक्षकों और समाज के लिए भी संदेश है जो चुप्पी साधे रहते हैं। अब हर स्कूल में यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी लड़की अपने शरीर की वजह से शिक्षा से वंचित न रहे। वहीं, राज्यों को जल्द ही इन निर्देशों को लागू करने की योजना बनानी होगी, ताकि यह बदलाव जमीनी स्तर पर दिखे। आगे की प्रगति पर नजर रखी जा रही है।

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