
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का प्रोत्साहन नियम, 2026’ ने भारतीय शिक्षा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक ओर इन नियमों का उद्देश्य परिसरों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करना और समावेशिता लाना है, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और शिक्षकों के बीच असुरक्षा और उपेक्षा की भावना गहरी होती जा रही है।
एकतरफा संरचना और प्रतिनिधित्व का अभाव
नए नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान में ‘इक्विटी कमेटी’ (Equity Committee) बनाना अनिवार्य है। विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि इस समिति में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों का होना तो अनिवार्य है, लेकिन ‘सामान्य वर्ग’ के प्रतिनिधित्व के लिए कोई प्रावधान नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि बिना निष्पक्ष संतुलन के ये समितियां ‘कंगारू कोर्ट’ बन सकती हैं, जहाँ एक वर्ग को पहले से ही ‘दोषी’ मान लिया जाएगा।
झूठी शिकायतों के खिलाफ ढाल की कमी
UGC के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की भारी वृद्धि हुई है। नियमों में शिकायतकर्ताओं के लिए गोपनीयता और सुरक्षा के कड़े प्रावधान हैं, लेकिन ‘दुर्भावनापूर्ण’ या ‘झूठी’ शिकायतों को रोकने के लिए कोई दंड या स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। सामान्य वर्ग के छात्रों का डर है कि आपसी रंजिश या अकादमिक प्रतिस्पर्धा के कारण उन्हें निशाना बनाया जा सकता है, जिससे उनका करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा पल भर में नष्ट हो सकती है।
प्रतिभा पलायन और मानसिक दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्र पहले से ही उच्च कट-ऑफ, महंगी फीस और सीमित अवसरों के दबाव में हैं। अब इन नए नियमों ने एक ‘अदृश्य हाशिए’ (Invisible Marginalization) की स्थिति पैदा कर दी है। मिडिल क्लास परिवारों से आने वाले ये छात्र, जो किसी भी कोटे के दायरे में नहीं आते, खुद को संस्थान के भीतर ही ‘अपरिचित’ महसूस करने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियमों में सुधार नहीं हुआ, तो यह भारत से मेधावी छात्रों के ‘ब्रेन ड्रेन’ (Brain Drain) की गति को और तेज कर देगा।
समानता या नया विभाजन?
इक्विटी का अर्थ सभी के लिए न्याय होना चाहिए। विशेषज्ञों की मांग है कि UGC इन नियमों पर पुनर्विचार करे और सामान्य वर्ग के हितों की रक्षा के लिए ‘सिमेट्रिक सेफगार्ड’ (Symmetric Safeguards) पेश करे। कैंपस को वैचारिक और सामाजिक युद्ध का मैदान बनने से रोकने के लिए समावेशिता के नाम पर किसी एक वर्ग को हाशिए पर धकेलना आत्मघाती साबित हो सकता है।
