
बिहार सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा भारी-भरकम राशि के खर्च का ब्यौरा न दिए जाने पर पटना हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर 70,877 करोड़ रुपये कहां खर्च किए गए हैं, जिनके ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (Utility Certificates – UC) अब तक जमा नहीं किए गए हैं। चीफ जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने इस मामले में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से दो महीने के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है।
क्या है पूरा मामला?
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट और अदालत में पेश याचिका के अनुसार, बिहार सरकार के विभिन्न विभागों ने वित्तीय वर्ष 2016-17 से लेकर 2022-23 के बीच खर्च की गई राशि के 49,649 उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए हैं। नियमानुसार, किसी भी सरकारी योजना के लिए आवंटित धन का उपयोग करने के बाद विभाग को यह प्रमाण पत्र देना होता है कि पैसा उसी मद में खर्च हुआ है जिसके लिए वह जारी किया गया था। प्रमाण पत्र न मिलने का सीधा मतलब है कि 70 हजार करोड़ रुपये के खर्च की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पा रही है।
सीबीआई जांच की उठी मांग
याचिकाकर्ता किशोर कुमार ने अदालत से इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई (CBI) या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की गुहार लगाई है। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि हाईकोर्ट के किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाए। अदालत ने इतनी बड़ी संख्या में उपयोगिता प्रमाणपत्रों के लंबित होने को ‘वित्तीय अनुशासन’ का गंभीर उल्लंघन माना है।
कैग की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार ने 2023-24 में 14.47% की विकास दर हासिल की है, जो सराहनीय है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू डराने वाला है:
बढ़ती देनदारियां: राज्य की कुल देनदारी बढ़कर 3,98,560.98 करोड़ रुपये हो गई है, जो पिछले साल की तुलना में 12.34% अधिक है।
लापता डीसी बिल: यूसी के अलावा, 9,205.76 करोड़ रुपये के आकस्मिक विपत्र (Detailed Contingency Bills) भी अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।
लक्ष्य से पीछे: बिहार 15वें वित्त आयोग द्वारा तय किए गए कई वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहा है।
वित्तीय पारदर्शिता पर संकट
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा न करना केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की आशंका को भी जन्म देता है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि पैसा सही जगह लगा है, तब तक इसे वित्तीय अनियमितता के दायरे में रखा जाता है। अब सबकी नजरें दो महीने बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को पाई-पाई का हिसाब देना होगा।


