
मकर संक्रांति के पावन अवसर पर बिहार की राजनीति का पारा ‘दही-चूड़ा भोज’ के बहाने चढ़ा हुआ है। इस बार राज्य की सियासत में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। सालों से जिस 10 सर्कुलर रोड (राबड़ी आवास) को दही-चूड़ा भोज का मुख्य केंद्र माना जाता था, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। इसके उलट, लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव इस परंपरा की कमान संभालते हुए एक भव्य आयोजन कर रहे हैं, जिसे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और नए समीकरणों की आहट के रूप में देखा जा रहा है।
परंपरा का हस्तांतरण: राबड़ी आवास नहीं, तेज प्रताप बने मेजबान
दशकों से लालू यादव का दही-चूड़ा भोज बिहार की राजनीति में संवाद का एक बड़ा मंच रहा है। लेकिन इस बार पिता की अनुपस्थिति और परिवार के भीतर बदलते समीकरणों के बीच तेज प्रताप ने इस विरासत को अपने कंधे पर लिया है। भोज से पहले तेज प्रताप दिल्ली जाकर अपने पिता लालू यादव का आशीर्वाद लेकर लौटे हैं। इसके साथ ही, सात महीने की लंबी तल्खी के बाद वे खुद राबड़ी आवास पहुंचे और तेजस्वी यादव सहित पूरे परिवार को निमंत्रण दिया।
विरोधियों को न्योता और नए समीकरणों की चर्चा
तेज प्रताप के इस भोज की सबसे चौंकाने वाली बात मेहमानों की सूची है। उन्होंने केवल अपनी पार्टी के सहयोगियों को ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, और डिप्टी सीएम विजय सिन्हा समेत एनडीए के दिग्गज नेताओं को भी आमंत्रित किया है। दिलचस्प बात यह है कि तेज प्रताप हाल ही में विजय सिन्हा के आवास पर आयोजित भोज में भी नजर आए थे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 2025 विधानसभा चुनाव से पहले तेज प्रताप अपनी एक अलग और समावेशी राजनीतिक छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
मामा साधु यादव के साथ खत्म होगी कड़वाहट?
सामाजिक रिश्तों के लिहाज से सबसे बड़ा कदम तेज प्रताप का अपने मामा साधु यादव को न्योता देना है। ऐश्वर्या राय विवाद के बाद से दोनों के बीच भारी कड़वाहट रही है, लेकिन इस बार तेज प्रताप ने ‘भूल और सुधार’ की नीति अपनाते हुए पुरानी दूरियों को मिटाने का संकेत दिया है।
एनडीए के खेमे में भी जुटी भीड़
वहीं दूसरी ओर, एनडीए खेमे में भी मकर संक्रांति की धूम है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और मंत्री रत्नेश सदा ने भी अपने-अपने आवास पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और अन्य बड़े नेताओं की उपस्थिति रहने वाली है। बिहार की राजनीति में यह दही-चूड़ा महज एक पारंपरिक पकवान नहीं, बल्कि आने वाले समय में बनने और बिगड़ने वाले गठबंधनों का लिटमस टेस्ट साबित होने वाला है। सबकी निगाहें अब तेज प्रताप के मंच पर लगने वाले ‘सियासी जमावड़े’ पर टिकी हैं।
