
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में ‘लैंड फॉर जॉब’ (जमीन के बदले नौकरी) घोटाले की सुनवाई के दौरान महीनों बाद लालू परिवार के सदस्य एक साथ नजर आए। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव समेत परिवार के अन्य सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी किया था।
महीनों बाद साथ दिखे तेजस्वी और तेज प्रताप
अदालती कार्यवाही के दौरान कोर्ट परिसर में एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिला। लंबे समय बाद पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव एक ही जगह मौजूद रहे। उनके साथ मीसा भारती और हेमा यादव भी कोर्ट पहुँचीं। हालांकि, स्वास्थ्य कारणों के चलते राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके, वह और राबड़ी देवी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यवाही से जुड़े। भाइयों के बीच की इस मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
क्या है ‘लैंड फॉर जॉब’ का पूरा मामला?
यह मामला उस दौर का है जब लालू प्रसाद यादव 2004 से 2009 के बीच केंद्रीय रेल मंत्री थे। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का आरोप है कि रेलवे के विभिन्न जोन (मुख्यतः ग्रुप-डी पदों) में नियुक्तियां करने के बदले उम्मीदवारों से जमीनें ली गईं। सीबीआई ने अपनी जांच में यह दावा किया है कि ये तमाम जमीनें उस समय की बाजार दर से बहुत ही मामूली कीमतों पर खरीदी गई थीं। जांच एजेंसियों का यह भी आरोप है कि कई प्राइम लोकेशन की कीमती जमीनें लालू परिवार के सदस्यों के नाम पर ‘गिफ्ट’ यानी उपहार के तौर पर हस्तांतरित करवाई गईं। इस पूरे मामले में ईडी और सीबीआई अब तक कई दौर की चार्जशीट दाखिल कर चुकी हैं, जिसमें तेजस्वी यादव को भी प्रमुख आरोपी के रूप में नामजद किया गया है।
कोर्ट के फैसले से बढ़ेगी राजनीतिक तपिश
आज की सुनवाई इसलिए अहम है क्योंकि विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने आरोपियों के खिलाफ आरोप (Charges) तय करने पर अपना आदेश सुना सकते हैं। यदि कोर्ट आरोप तय कर देता है, तो इस मामले का औपचारिक ‘ट्रायल’ शुरू हो जाएगा। इसका अर्थ है कि अब गवाहों के बयान और सबूतों की जांच की प्रक्रिया तेज होगी, जो चुनाव से पहले राजद के लिए बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन सकती है।
बिहार में सियासी घमासान
पटना से लेकर दिल्ली तक इस पेशी पर बयानबाजी जारी है। राजद समर्थकों का कहना है कि यह केंद्र सरकार द्वारा जांच एजेंसियों का दुरुपयोग है और विपक्षी नेताओं को डराने की साजिश है। दूसरी तरफ, भाजपा और सत्ताधारी गठबंधन इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून का डंडा बता रहे हैं। 29 जनवरी की अगली तारीख और कोर्ट के कड़े रुख ने लालू परिवार की नींद उड़ा दी है।