
केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के संस्थापक जीतन राम मांझी एक बार फिर अपने बेबाक और विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में हैं। इस बार उनके बयानों ने न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि, बल्कि केंद्र और बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर दी है। मांझी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि सांसद और विधायक कमीशन लेते हैं, साथ ही उन्होंने राज्यसभा सीट के मुद्दे पर गठबंधन छोड़ने और मंत्री पद से इस्तीफे की चेतावनी दी है।
कमीशनखोरी और चुनाव में धांधली का सनसनीखेज दावा
जीतन राम मांझी ने हाल ही में एक सभा के दौरान यह कहकर राजनीतिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया कि “सभी सांसद और विधायक विकास कार्यों में कमीशन लेते हैं।” उन्होंने पारदर्शिता का दावा करते हुए खुद का उदाहरण दिया और कहा कि उन्होंने अपनी पार्टी को जो 40 लाख रुपये का चंदा दिया था, वह कमीशन से ही अर्जित किया गया था।
इतना ही नहीं, मांझी ने चुनावी निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान लगा दिया। उन्होंने दावा किया कि 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जिलाधिकारी (DM) से कहकर अपनी पार्टी के एक हारते हुए उम्मीदवार को 2700 वोटों से जीत दिलवाई थी। विपक्ष अब इन बयानों को आधार बनाकर एनडीए सरकार पर हमलावर है।
राज्यसभा सीट को लेकर तकरार और इस्तीफे की धमकी
बिहार में अप्रैल में खाली हो रही 5 राज्यसभा सीटों को लेकर मांझी खासे नाराज हैं। उनका आरोप है कि भाजपा और जेडीयू ने आपस में सीटें बांट ली हैं, जबकि ‘हम’ को नजरअंदाज किया जा रहा है। 21 दिसंबर 2025 को दिए अपने ताजा बयान में उन्होंने कहा कि यदि उन्हें राज्यसभा सीट नहीं मिली, तो वे केंद्रीय मंत्री पद छोड़ देंगे। उन्होंने अपने बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन को भी मंत्री पद का मोह त्यागने की सलाह दी है।
राम-रावण और शराबबंदी पर पुराने विवाद
मांझी का विवादों से पुराना नाता रहा है। वे भगवान राम और रामायण को कई बार ‘काल्पनिक’ बता चुके हैं, जबकि रावण को राम से अधिक कर्मकांडी बताते रहे हैं। बिहार में नीतीश सरकार की शराबबंदी नीति पर भी वे अक्सर सवाल उठाते हैं और गरीबों के लिए ‘थोड़ी-थोड़ी पीने’ की छूट देने की वकालत करते हैं।
दशरथ मांझी और जातिगत उपेक्षा का आरोप
हालिया बयानों की कड़ी में उन्होंने ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि दशरथ मांझी ने 22 साल तक पहाड़ काटकर रास्ता बनाया, लेकिन चूंकि वे भुइयां जाति से थे, इसलिए उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो किसी अन्य जाति के व्यक्ति को मिलता।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मांझी का यह ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ वाला अंदाज आगामी चुनावों में सीट शेयरिंग के दौरान मोलभाव करने की एक रणनीति हो सकती है, लेकिन इसने एनडीए के भीतर दरारें स्पष्ट कर दी हैं।