
बिहार में परिवहन विभाग की कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभाग के कुछ अधिकारी और कर्मचारी पैसों के आगे इतने मदमस्त हो गए कि उन्हें जिंदा और मृतक में कोई फर्क तक नहीं दिखाई देता। आदतन भ्रष्टाचार की अपनी प्रवृत्ति के चलते उन्होंने जान-बूझकर ऐसी करतूत की कि विभाग में भौतिक सत्यापन (Physical Verification) और व्यक्ति की उपस्थिति के बिना ही सरकारी दस्तावेज सिर्फ पैसों के लेन-देन के आधार पर जारी किए जा रहे हैं। इस घोटाले ने यह साफ कर दिया कि सुशासन के दावे और हकीकत के बीच कितना बड़ा फ़र्क है।
नियमों के मुताबिक, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए बायोमेट्रिक डेटा और लर्निंग टेस्ट के दौरान व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य है। लेकिन बिहार में कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और दलालों ने इस कानून को पैसों के आगे ठेंगा दिखा दिया। कागजों पर मृत व्यक्ति को जिंदा दिखाकर उसे सड़क पर वाहन चलाने का लाइसेंस जारी कर दिया गया। हालांकि, यह घटना नीतीश सरकार के ‘सुशासन’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों पर सवाल खड़े करती है और प्रशासन की विश्वसनीयता को झकझोरती है। साथ ही, यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सड़क सुरक्षा और समाज के लिए भी गंभीर खतरा है, क्योंकि इससे फर्जी पहचान और अपराधियों के हाथों में लाइसेंस जाने का रास्ता खुल जाता है।
गौरतलब है कि फर्जीवाड़े के उजागर होने के बाद परिवहन विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मांग की है कि मृतक का जारी किया गया लाइसेंस तुरंत रद्द किया जाए और जांच में यह पता लगाया जाए कि किस लॉग-इन आईडी से यह फाइल पास हुई। साथ ही दोषी MVI और क्लर्क पर सख्त कानूनी कार्रवाई की भी जोरदार मांग उठी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो न केवल विभाग की विश्वसनीयता को धक्का लगेगा, बल्कि आम जनता का सरकारी व्यवस्था में भरोसा भी कम हो जाएगा।