शून्य सीट और सिमटती कांग्रेस: क्या 2025 की ‘चुनावी चोट’ पीके और कांग्रेस को लाएगी एक साथ
दिल्ली ,‘चुनावी चोट’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीतिक जमीन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। इस भूचाल के बाद अब नए समीकरणों की आहट सुनाई देने लगी है। सबसे ज्यादा चर्चा ‘जन सुराज’ के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) को लेकर है। हाल के दिनों में उनके बदले हुए तेवर और कांग्रेस नेतृत्व के प्रति बढ़ती ‘सॉफ्टनेस’ ने सियासी गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पीके एक बार फिर कांग्रेस के करीब जा रहे हैं?
10 जनपथ पर घंटों चली बैठक के मायने
सियासी अटकलों को हवा तब मिली जब दिसंबर 2025 के मध्य में प्रशांत किशोर ने दिल्ली स्थित सोनिया गांधी के आवास 10, जनपथ पर प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की। सूत्रों के मुताबिक, यह बैठक कई घंटों तक चली। हालांकि, दोनों ही पक्षों ने इसे ‘निजी मुलाकात’ करार दिया, लेकिन राजनीतिक पंडित इसे 2025 के चुनाव परिणामों के बाद की ‘डैमेज कंट्रोल’ रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
राहुल गांधी के समर्थन में पीके की ‘बैटिंग’
मुलाकात के बाद अब प्रशांत किशोर का एक बयान चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अपनी ‘बिहार नवनिर्माण यात्रा’ के दौरान पूर्वी चंपारण में पीके ने खुलकर राहुल गांधी का समर्थन किया। उन्होंने संसद में नेता प्रतिपक्ष को बोलने की अनुमति न दिए जाने पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि “विपक्ष की आवाज दबाना लोकतंत्र के खिलाफ है।” पीके का यह स्टैंड चौंकाने वाला है, क्योंकि इससे पहले वे अक्सर कांग्रेस और राहुल गांधी की कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे हैं।
2025 की हार ने बदला नजरिया?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के चुनावी नतीजों ने दोनों पक्षों को सोचने पर मजबूर किया है:
जन सुराज की मायूसी: पीके की पार्टी ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन खाता भी नहीं खोल सकी। 3.44% वोट शेयर के साथ पार्टी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत है।
कांग्रेस की सुस्ती: 61 सीटों पर लड़कर महज 6 सीटें जीतना कांग्रेस के लिए 2020 (19 सीटें) के मुकाबले बड़ी गिरावट है।
2022 का अधूरा प्रजेंटेशन होगा पूरा?
गौरतलब है कि अप्रैल 2022 में भी प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए ‘एम्पवर्ड एक्शन ग्रुप 2024’ का खाका पेश किया था। तब बात ‘फ्री हैंड’ न मिलने के कारण बिगड़ गई थी। लेकिन अब, जब बिहार में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना खत्म होती दिख रही है, तो क्या पीके और कांग्रेस अपनी पुरानी दूरियां मिटाकर किसी बड़े गठबंधन की नींव रखेंगे? फिलहाल, यह केवल अटकलें हैं, लेकिन पीके के हालिया कदम किसी बड़ी राजनीतिक खिचड़ी के पकने का संकेत जरूर दे रहे हैं।

