
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पुलिस प्रशासन और आम जनता के बीच भरोसे को हिलाकर रख दिया है। ‘प्रगतिशील बाल विकास फाउंडेशन’ नाम के एक एनजीओ (NGO) ने जिले के दर्जनों युवाओं को खाकी वर्दी का सपना दिखाकर लाखों रुपये की चपत लगा दी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जालसाजों ने युवाओं का भरोसा जीतने के लिए पुलिस थानों के परिसर का इस्तेमाल किया, जिससे युवाओं को लगा कि यह बहाली पूरी तरह सरकारी और वैध है।
वर्दी का सपना और लाखों की लूट
जानकारी के अनुसार, इस एनजीओ ने जिले के विभिन्न क्षेत्रों के करीब 42 युवाओं को अपना शिकार बनाया है। इन युवाओं से ‘पुलिस मित्र’ के पद पर बहाली के नाम पर 20,000 रुपये से लेकर 1.5 लाख रुपये तक की अवैध वसूली की गई। ठगी का शिकार हुए युवाओं में अधिकतर गरीब परिवारों से हैं, जिनमें से कई चौकीदारों के बेटे भी शामिल हैं। एनजीओ ने इन युवाओं को 16,000 रुपये प्रति माह वेतन देने का झांसा दिया था।
थाना परिसर में रचा गया फर्जीवाड़े का खेल
ठगों ने युवाओं को विश्वास में लेने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया। पीड़ित युवकों के अनुसार, उन्हें अरेराज, घोड़ासहन, पलनवा, गोविंदगंज और छतौनी जैसे विभिन्न थानों में बुलाया गया था। वहां पुलिस की मौजूदगी में ही उन्हें आई-कार्ड और नियुक्ति पत्र सौंपे गए। थाने के भीतर इस तरह की गतिविधि देखकर युवाओं को संदेह की कोई गुंजाइश नहीं लगी और उन्होंने कर्ज लेकर ठगों की जेबें भर दीं।
एसपी के आदेश के बाद विभाग में हड़कंप
मामला जैसे ही पूर्वी चंपारण के एसपी स्वर्ण प्रभात के संज्ञान में आया, उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए। एसपी ने कोटवा थाने में एनजीओ और उसके संचालक के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है। साथ ही, उन पुलिसकर्मियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है जिनकी शह पर यह खेल थाने के भीतर चल रहा था। एसपी ने सख्त निर्देश दिए हैं कि एनजीओ के मालिक को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए।
बेरोजगारी का फायदा उठा रहे ठग
यह घटना बेरोजगारी के उस दर्दनाक चेहरे को उजागर करती है, जहां सरकारी नौकरी की चाहत में युवा आसानी से जालसाजों के चंगुल में फंस जाते हैं। पीड़ित युवाओं का कहना है कि वे अब आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके हैं। कई परिवारों ने अपनी जमीन गिरवी रखकर या ऊंची ब्याज दर पर पैसे लेकर यह राशि जमा की थी। अब उन्हें न नौकरी मिली और न ही उनके पैसे वापस मिल रहे हैं।
पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस ठगी के तार और कहां-कहां जुड़े हैं। इस घटना ने पुलिस की छवि पर भी सवाल खड़े किए हैं कि आखिर एक निजी एनजीओ थाना परिसर में इस तरह के फर्जी कार्यक्रम कैसे आयोजित कर सका।