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‘घूसखोर पंडत’ के बाद अब ‘यादव जी…’ पर बवाल! देखें वो 8 फिल्में जिन्होंने आईना दिखाकर हिला दी थी जाति की दीवारें!.

बिहार,‘घूसखोर पंडत’

भारतीय सिनेमा और समाज के बीच का रिश्ता हमेशा से गहरा और संवेदनशील रहा है। हाल ही में फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ को लेकर उत्तर प्रदेश के संभल और फिरोजाबाद जैसे इलाकों में उपजा विवाद इसी संवेदनशीलता का ताजा उदाहरण है। फिल्म के नाम और उसकी कहानी (यादव युवती और मुस्लिम युवक के प्रेम संबंध) पर समाज ने आपत्ति जताई है, जिससे इसकी 27 फरवरी की रिलीज पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब किसी फिल्म के नाम या विषय पर जातीय भावनाओं के आहत होने का दावा किया गया हो। इससे पहले नेटफ्लिक्स की ‘घूसखोर पंडत’ भी इसी तरह के विवादों में घिरी थी। आइए नजर डालते हैं उन प्रमुख फिल्मों पर, जिन्होंने जातिगत समीकरणों, संघर्ष और सामाजिक व्यवस्था को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है।

प्रेम और जाति की दीवारें;
भारतीय समाज में अंतरजातीय प्रेम को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ा है, जिसे इन फिल्मों ने बखूबी दिखाया है:-
सैराट (मराठी): यह फिल्म ऊंची और निचली जाति के बीच पनपे प्रेम और उसके दुखद सामाजिक परिणामों को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश करती है।
मसान: वाराणसी की गलियों में बसी यह फिल्म दिखाती है कि कैसे जातिगत सोच एक युवा प्रेम कहानी के आड़े आती है।
फैंड्री: एक निचली जाति के लड़के के एक ऊंची जाति की लड़की के प्रति प्रेम और उसके बाद मिलने वाले सामाजिक तिरस्कार की मार्मिक कहानी।
परियेरुम पेरुमाल: दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि की यह फिल्म शिक्षा और मित्रता के बीच आने वाली गहरी जातीय दरारों को उजागर करती है।

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फिल्म मुख्य विषय विशेष उपलब्धि
जय भीम (2021) वकील चंद्रू द्वारा एक दलित परिवार को न्याय दिलाने का कानूनी संघर्ष। ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि और वैश्विक सराहना।
आर्टिकल 15 संविधान के अनुच्छेद 15 के इर्द-गिर्द बुनी गई एक ब्राह्मण पुलिस अधिकारी की कहानी। जातिगत भेदभाव और ग्रामीण अपराधों की नग्न सच्चाई का चित्रण।
12वीं फेल आईपीएस मनोज कुमार शर्मा के जीवन पर आधारित संघर्ष की कहानी। सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को तोड़कर मिली सफलता का प्रेरणादायक सफर।
हालांकि, यह फिल्म महज एक कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव के खिलाफ एक पूरे गांव के विद्रोह की आवाज है। फिल्म का नायक ‘कर्णन’ अपने हक के लिए व्यवस्था और ऊंची जाति के वर्चस्व से टकराता है। सिनेमा जब समाज की कड़वी सच्चाइयों या किसी विशेष समुदाय को केंद्र में रखकर कहानी कहता है, तो अक्सर कला की स्वतंत्रता और सामुदायिक गौरव के बीच बहस छिड़ जाती है। ‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर जारी विरोध इसी वैचारिक टकराव का एक नया अध्याय है।

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