
बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली ए.एन.एम. (ANM) कर्मियों के लिए सरकारी सिस्टम की बेरुखी अब मानसिक प्रताड़ना बनती जा रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों नियुक्ति पत्र पाने के आठ महीने बाद भी हजारों नर्सों को एक रुपया वेतन नसीब नहीं हुआ है। अब स्वास्थ्य विभाग ने वेतन जारी करने के लिए एक ऐसी विवादित ‘वसूली’ की शर्त रखी है, जिसने कर्मचारियों के बीच डर और आक्रोश पैदा कर दिया है।
मुख्यमंत्री ने बांटी थी नौकरियां, सिस्टम ने रोका वेतन
बिहार तकनीकी सेवा आयोग (BTSC) द्वारा चयनित 7,468 ए.एन.एम. अभ्यर्थियों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बड़े उत्साह के साथ नियुक्ति पत्र सौंपा था। नियमानुसार, कार्यभार संभालने के तीन महीने के भीतर दस्तावेजों का सत्यापन (Verification) पूरा कर वेतन शुरू कर देना चाहिए था। लेकिन हकीकत यह है कि आठ महीने बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों के प्रमाण पत्रों की जांच तक नहीं कर पाया है।
पुश नोटिफिकेशन के लिए सब्सक्राइब करें।
डॉ. रेखा झा ने जताई नाराजगी: “प्रशासनिक सुस्ती खेदजनक”
विभाग की इस सुस्ती पर निदेशक प्रमुख (नर्सिंग) डॉ. रेखा झा ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने सभी जिलों के सिविल सर्जनों को पत्र लिखकर कहा है कि आठ महीने बाद भी सत्यापन रिपोर्ट का न मिलना “अत्यंत खेदजनक” है। यह स्थिति दर्शाती है कि निचले स्तर पर अधिकारी और लिपिक अपने काम के प्रति कितने लापरवाह हैं, जिसका खामियाजा उन नर्सों को भुगतना पड़ रहा है जो अग्रिम मोर्चे पर सेवाएं दे रही हैं।
‘वसूली’ की शर्त: वेतन के साथ लटका दी तलवार
लगातार बढ़ते दबाव के बाद विभाग ने अब वेतन जारी करने का रास्ता तो निकाला है, लेकिन एक डरावनी शर्त के साथ। आदेश के अनुसार: जिन कर्मियों का डेटा HRMS पोर्टल पर दर्ज है, उन्हें वेतन दिया जाएगा। लेकिन, यदि भविष्य में किसी का प्रमाण पत्र गलत या फर्जी पाया गया, तो अब तक भुगतान की गई पूरी राशि की “एकमुश्त वसूली” की जाएगी। कर्मचारियों का कहना है कि विभाग अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए नर्सों पर रिकवरी की तलवार लटका रहा है। अगर आठ महीनों में जांच नहीं हुई, तो इसमें कर्मचारियों का क्या दोष?
