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बिहार के मखाने का दुनिया में डंका: 6 महीने में 120 टन निर्यात का रिकॉर्ड, चीन बना रहा है इससे जीवनरक्षक दवाइयां

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बिहार का ‘सफेद सोना’ यानी मखाना अब सात समंदर पार अपनी धाक जमा रहा है। राज्य ने कृषि निर्यात के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। शनिवार को पटना के बिहटा ड्राई पोर्ट से 5 टन मखाने की एक बड़ी खेप चीन के लिए रवाना की गई। पिछले छह महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार ने दुनिया के विभिन्न देशों को कुल 120 टन मखाना एक्सपोर्ट किया है, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।

चीन में ‘कियान शी’ के नाम से मशहूर है मखाना
मखाने की इस बढ़ती मांग के पीछे एक दिलचस्प वजह सामने आई है। चीन, बिहार से भारी मात्रा में मखाना इसलिए खरीद रहा है क्योंकि वहां इसका उपयोग केवल खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा (Traditional Chinese Medicine – TCM) में ‘जड़ी-बूटी’ के तौर पर किया जाता है।

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दवाइयों में उपयोग: चीन में मखाने को ‘कियान शी’ कहा जाता है। वहां की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में किडनी (गुर्दे) से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने के लिए मखाने से बनी दवाइयों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

निर्यात मार्ग: बिहटा से रवाना हुई यह खेप कोलकाता बंदरगाह के रास्ते समुद्र मार्ग से चीन पहुंचेगी।

वैश्विक बाजार और GI Tag का कमाल
मिथिलांचल के मखाने को मिले GI Tag ने इसकी ब्रांड वैल्यू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाई दी है। अब मखाने को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक विशिष्ट HS Code (Harmonized System Code) भी मिल गया है, जिससे इसके वर्गीकरण और निर्यात में आसानी हो रही है।

प्रमुख खरीदार: बिहार से मखाना खरीदने वाले देशों में अमेरिका शीर्ष पर है, जिसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, यूएई (दुबई) और अब चीन का नंबर आता है। हालांकि, पिछले साल ‘ट्रंप टैरिफ’ के कारण अमेरिका में मखाने की कीमतें 10 से 15 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थीं, जिससे निर्यात प्रभावित हुआ था। यही कारण है कि अब बिहार के निर्यातक चीन और खाड़ी देशों जैसे नए बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं।

एपिडा और मखाना विकास बोर्ड की जुगलबंदी
इस सफलता के पीछे केंद्र और राज्य सरकार का साझा प्रयास है। बिहार में एपिडा (APEDA) कार्यालय और मखाना विकास बोर्ड की स्थापना के बाद से निर्यातकों को तकनीकी और कागजी कार्यवाही में काफी मदद मिली है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय और बिहार सरकार के समन्वय से अब छोटे किसान भी वैश्विक बाजार का हिस्सा बन रहे हैं।

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