
राजस्थान की छात्र राजनीति से निकलकर देश के सबसे बड़े छात्र संगठन की कमान संभालना कोई छोटी बात नहीं है। विनोद जाखड़ की एनएसयूआई (NSUI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति ने न केवल राजस्थान का मान बढ़ाया है, बल्कि कांग्रेस की भावी राजनीति के संकेत भी दे दिए हैं। एनएसयूआई के 55 साल के इतिहास में यह पहला मौका है जब मरूधरा के किसी युवा नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी मिली है। अब तक इस पद पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली या दक्षिण भारतीय राज्यों का दबदबा रहा था, लेकिन विनोद जाखड़ ने इस मिथक को तोड़ दिया।
संघर्ष से सफलता तक का सफर;
जाखड़ की पहचान एक ‘एक्शन मोड’ वाले नेता की रही है। उनकी इस नियुक्ति के पीछे कुछ मुख्य कारण रहे:
छात्रसंघ चुनाव की मांग: राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने के लिए उनका मुखर आंदोलन।
वैचारिक लड़ाई: कैंपस में विपक्षी विचारधारा (RSS/ABVP) के कार्यक्रमों का कड़ा विरोध।
जमीनी पकड़: जनवरी 2024 में प्रदेश अध्यक्ष बनने के मात्र कुछ महीनों के भीतर ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपयोगिता साबित करना।
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वेतन का सच;
सोशल मीडिया पर अक्सर यह जिज्ञासा देखी जाती है कि क्या इतने बड़े पद पर बैठने वाले नेता को ‘सैलरी’ मिलती है? इसका सीधा जवाब है है कि नहीं। एनएसयूआई एक राजनीतिक संगठन का हिस्सा है, कोई सरकारी विभाग नहीं। यहाँ पद ‘मानद’ (Honorary) होते हैं। वहीं, कांग्रेस पार्टी या एनएसयूआई अपने पदाधिकारियों को मासिक वेतन नहीं देती। यह पूरी तरह से एक राजनीतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता है। हालांकि, संगठन के काम से जुड़ी यात्राओं या बड़े कार्यक्रमों के खर्चों का वहन पार्टी के फंड से किया जाता है, लेकिन इसे व्यक्तिगत कमाई या ‘पे-चेक’ नहीं माना जा सकता।
नियुक्ति के मायने;
विनोद जाखड़ की ताजपोशी यह दर्शाती है कि कांग्रेस अब ‘परफॉर्म करने वाले’ युवाओं को तरजीह दे रही है। यह राजस्थान के उन हजारों छात्र नेताओं के लिए भी एक उम्मीद है जो छात्र राजनीति को ही अपना भविष्य मानते हैं। जाखड़ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आगामी छात्र चुनावों में संगठन को मजबूती देना और देश भर के विश्वविद्यालयों में एनएसयूआई का खोया हुआ आधार वापस पाना है।
