
बिहार की राजधानी पटना में कानून और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी पर पटना हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने पटना जिलाधिकारी (DM) कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताते हुए उन पर 5,000 रुपये का आर्थिक दंड (जुर्माना) लगाया है। हाईकोर्ट ने यह कार्रवाई एक आपराधिक मामले में अपील दायर करने में हुई ‘अनावश्यक और गंभीर देरी’ को लेकर की है।
क्यों लगा भारी जुर्माना?
मामला एक आपराधिक केस से जुड़ा है, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया था। राज्य सरकार को इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर करनी थी। जानकारी के अनुसार, महाधिवक्ता (Advocate General) और विधि विभाग ने समय रहते अपनी कानूनी राय डीएम कार्यालय को भेज दी थी। इसके बावजूद, जिलाधिकारी कार्यालय ने अपील दायर करने की तय समय-सीमा का उल्लंघन किया और काफी विलंब के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि जब सिस्टम के वरिष्ठ स्तर से हरी झंडी मिल चुकी थी, तो डीएम कार्यालय की ओर से फाइल को लटकाए रखना ‘गंभीर लापरवाही’ की श्रेणी में आता है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी तंत्र की ऐसी सुस्ती के कारण न्याय प्रक्रिया बाधित होती है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जिम्मेदार तंत्र पर आर्थिक दंड
अदालत ने डीएम कार्यालय को यह जुर्माना राशि निर्धारित समय के भीतर जमा करने का आदेश दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के अन्य प्रशासनिक कार्यालयों के लिए भी एक कड़ा संदेश है। अक्सर यह देखा जाता है कि प्रशासनिक ढुलमुल नीति के कारण महत्वपूर्ण कानूनी मामले समय-सीमा (Limitation Period) के बाहर हो जाते हैं, जिससे अपराधियों को लाभ मिलने की संभावना बनी रहती है।
हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद पटना डीएम कार्यालय और प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मच गया है। अब यह देखना होगा कि इस जुर्माने के बाद कार्यालय के भीतर जवाबदेही तय की जाती है या नहीं और भविष्य में ऐसी तकनीकी गलतियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।