नियम 3(C) बनाम 3(E): क्या कैंपस में ‘सबकी सुरक्षा’ से समझौता कर रहा है UGC? समझें भेदभाव की उस नई परिभाषा को जिसे कोर्ट ने नकारा…
दिल्ली ,(UGC)

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय एक कानूनी और सामाजिक बहस के केंद्र में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम लागू किए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब पुराने (2012 के) नियम ही प्रभावी रहेंगे। हालांकि, यह कानूनी लड़ाई इस बात पर टिकी है कि क्या भेदभाव की परिभाषा को कुछ विशिष्ट वर्गों तक सीमित करना चाहिए, या इसे 2012 के नियमों की तरह सबके लिए खुला रखना चाहिए।
क्या है विवाद की जड़? (नियम 3(C) बनाम 3(E))
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विशेषता पुराना नियम 3(E) (2012) नया नियम 3(C) (2026)
दायरा व्यापक और सार्वभौमिक: इसमें जाति, धर्म, भाषा, लिंग, क्षेत्र और जन्म स्थान जैसे सभी आधार शामिल थे। विशिष्ट और सीमित: यह मुख्य रूप से केवल SC, ST और OBC वर्गों पर केंद्रित है।
सुरक्षा यह नियम हर छात्र और कर्मचारी को हर तरह के भेदभाव से सुरक्षा देता था। इसमें “जाति आधारित भेदभाव” को केवल इन तीन वर्गों तक सीमित परिभाषित किया गया है।
प्रभाव इसमें वर्ग विशेष के बजाय “व्यवहार” को प्राथमिकता दी गई थी। आलोचकों का मानना है कि यह कैंपस में नई “जातिगत रेखाएं” खींच सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
1) अस्पष्टता और दुरुपयोग: कोर्ट का मानना है कि नए नियम की भाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे इसके गलत इस्तेमाल की संभावना बनी रहती है।
2) सामाजिक एकता पर असर: कोर्ट ने टिप्पणी की कि कॉलेज ऐसे स्थान हैं जहाँ समाज को जोड़ा जाता है। जाति के आधार पर अलग परिभाषाएं देने से कैंपस का माहौल प्रभावित हो सकता है।
3) समानता का सिद्धांत: 2012 का नियम सभी को एक समान सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जबकि नया नियम भेदभाव को श्रेणियों में बांटता नजर आता है।
वर्तमान स्थिति;
– 2012 के नियम ही मान्य होंगे।
– किसी भी भेदभाव की शिकायत पुराने व्यापक प्रावधानों के तहत ही दर्ज की जाएगी।
– कैंपस में समानता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी प्रशासन की होगी।