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Happy Birthday Rabri Devi: 67 साल की हुईं राबड़ी देवी, जानें पांचवीं पास गृहिणी से CM बनने तक का सफर

बिहार,महिला मुख्यमंत्री

बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री और आरजेडी (RJD) की कद्दावर नेता राबड़ी देवी आज अपना 67वां जन्मदिन मना रही हैं। 1 जनवरी 1959 को जन्मीं राबड़ी देवी के लिए इस साल का जन्मदिन थोड़ा अलग है। पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित उनके आवास पर इस बार वह रौनक नहीं है, जो अमूमन लालू परिवार के आयोजनों में दिखती है।

आवास पर सन्नाटा: लालू दिल्ली में, तो तेजस्वी विदेश में
इस विशेष अवसर पर राबड़ी देवी अपने पटना स्थित आवास पर अकेली हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली में हैं, जहाँ हाल ही में उनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है। वहीं, बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव अपने परिवार के साथ विदेश दौरे पर हैं। हालांकि, परिवार की अनुपस्थिति के बावजूद सुबह से ही आरजेडी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का उनके आवास पर पहुंचना जारी है। समर्थकों ने फूलों के गुलदस्ते और बधाइयों के साथ अपनी ‘माता जी’ को शुभकामनाएं दीं।

जमींदार की बेटी से बिहार की मुख्यमंत्री तक
राबड़ी देवी का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। गोपालगंज जिले के सेलार कला गांव में एक बेहद संपन्न जमींदार शिव प्रसाद चौधरी के घर जन्मीं राबड़ी देवी का बचपन ऐशो-आराम में बीता। उनके पिता इलाके के बड़े ठेकेदार थे और बताया जाता है कि उनके दरवाजे सोने की परत से मढ़े थे। केवल पांचवीं तक पढ़ी राबड़ी देवी ने कभी नहीं सोचा था कि वे एक दिन देश के सबसे बड़े राज्य में से एक की कमान संभालेंगी।

15 की उम्र में तय हुआ रिश्ता, फिर बदली किस्मत
महज 15 साल की उम्र में उनके पिता ने तत्कालीन छात्र नेता लालू प्रसाद यादव को अपने दामाद के रूप में चुना। परिवार के विरोध के बावजूद पिता अपनी पसंद पर अडिग रहे। शादी के बाद राबड़ी देवी वर्षों तक केवल घर-परिवार संभालती रहीं। लेकिन साल 1997 में जब चारा घोटाले के चलते लालू यादव को जेल जाना पड़ा, तब उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका दिया। बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के राबड़ी देवी ने न केवल सत्ता संभाली, बल्कि लालू यादव की अनुपस्थिति में पार्टी को भी एकजुट रखा।

आज भी बिहार की राजनीति में राबड़ी देवी का सम्मान एक अभिभावक के तौर पर है। कार्यकर्ताओं के लिए वे सिर्फ नेता नहीं, बल्कि ‘ममता की मूरत’ भी मानी जाती हैं।

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