
बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़े फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य में महागठबंधन के भीतर जारी रार अब कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट बनकर मंडरा रही है। पिछले कुछ समय से बिहार कांग्रेस के विधायकों के बागी रुख और पार्टी कार्यक्रमों से उनकी बढ़ती दूरियों ने दिल्ली तक आलाकमान की नींद उड़ा दी है। खबर है कि राहुल गांधी ने इस संभावित टूट को रोकने के लिए खुद कमान संभाल ली है और बिहार के सभी 6 विधायकों को 23 जनवरी को दिल्ली तलब किया है।
संकट में बिहार कांग्रेस: क्यों बढ़ी आलाकमान की टेंशन?
बिहार विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद से ही राजद और कांग्रेस के रिश्तों में खटास देखी जा रही थी। लेकिन असली चिंता कांग्रेस के अपने ही कुनबे को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक, बिहार के कम से कम 4 विधायक पाला बदलने की फिराक में हैं और वे लगातार भाजपा या जदयू के संपर्क में बताए जा रहे हैं।
पार्टी के भीतर यह संकट तब गहरा गया जब प्रदेश नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों से कई विधायक गायब रहने लगे। हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू की बैठकों से चनपटिया विधायक अभिषेक रंजन, वाल्मीकिनगर के सुरेंद्र कुशवाहा और मनिहारी के मनोहर सिंह की अनुपस्थिति ने इन अफवाहों को और बल दे दिया है। हालांकि, पार्टी इसे व्यक्तिगत कारण बता रही है, लेकिन सियासी गलियारों में इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ या पाला बदलने की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
राहुल गांधी करेंगे ‘वन-टू-वन’ संवाद
दिल्ली में होने वाली इस हाई-प्रोफाइल बैठक का मुख्य उद्देश्य क्राइसिस मैनेजमेंट है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे संदिग्ध विधायकों के साथ व्यक्तिगत तौर पर बात करेंगे। इस दौरान निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा होने की संभावना है:
• नाराजगी के कारण: विधायकों से सीधे पूछा जाएगा कि वे संगठन या प्रदेश नेतृत्व से क्यों असंतुष्ट हैं।
• संगठन में बड़ी जिम्मेदारी: नाराज विधायकों को शांत करने के लिए उन्हें संगठन में बेहतर पद या भविष्य का आश्वासन दिया जा सकता है।
• राजनीतिक जोखिम: आलाकमान उन्हें दलबदल कानून और दूसरी पार्टियों में जाने से होने वाले राजनीतिक नुकसान के बारे में भी सचेत करेगा।
विधायक दल के नेता पर फंसा पेंच
बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आए दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आंतरिक कलह के कारण अब तक विधायक दल के नेता का चयन नहीं हो सका है। नेता न होने के कारण विधानसभा की समितियों में कांग्रेस अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पा रही है। दिल्ली दौरे के दौरान शकील अहमद खां की मौजूदगी में आपसी सहमति से नए नेता के नाम पर मुहर लग सकती है।
बिहार कांग्रेस के लिए यह बैठक ‘करो या मरो’ जैसी है। यदि 23 जनवरी को सभी 6 विधायक दिल्ली नहीं पहुँचते हैं, तो यह पार्टी के लिए एक बड़ा झटका होगा और बिहार में कांग्रेस के विभाजन की कहानी पर अंतिम मुहर लग सकती है।

