
सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक पिता की वसीयत को वैध ठहराते हुए कहा कि वसीयत लिखने वाले की इच्छा सर्वोपरि होती है। इस मामले में पिता ने अपनी बेटी शैला जोसेफ को अपनी संपत्ति से बाहर कर दिया था, क्योंकि उसने समुदाय से बाहर के लड़के से शादी की थी। कोर्ट ने इस वसीयत को चुनौती देने वाली बेटी की अपील खारिज कर दी है, और वसीयत के अनुसार संपत्ति के बंटवारे को सही ठहराया है।
यह मामला केरल का है, जहां 1988 में श्रीधरन नामक व्यक्ति ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत बनाई थी। इस वसीयत के तहत उन्होंने अपनी बेटी शैला को अपनी संपत्ति से बाहर कर दिया था और अन्य आठ बच्चों को संपत्ति देने का फैसला किया था। श्रीधरन ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि शैला ने समुदाय से बाहर शादी की है, इसलिए उसे संपत्ति से वंचित किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन ने इस मामले पर सुनवाई की। बेंच ने केरल हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि वसीयत लिखने वाले की इच्छा सर्वोपरि होती है। कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति को अपनी संपत्ति कैसे बांटी जाए, इसके लिए पूरी स्वतंत्रता होती है, और वसीयत से विचलन नहीं किया जा सकता।
शैला की ओर से सीनियर एडवोकेट पीबी कृष्णन ने कोर्ट में तर्क दिया था कि कम से कम 1/9 हिस्सा, जो संपत्ति का नगण्य भाग था, शैला को मिलना चाहिए। हालांकि, बेंच ने इसे खारिज करते हुए कहा कि संपत्ति के बंटवारे में समानता का सवाल नहीं उठता, क्योंकि यह टेस्टेटर की इच्छा है।
फैसले के बाद शैला का संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रह गया, क्योंकि वसीयत के अनुसार अन्य भाई-बहनों को संपत्ति सौंप दी गई है। शैला की पार्टिशन सूट भी कोर्ट ने खारिज कर दी। यह मामला संपत्ति के अधिकार और वसीयत के अधिकार पर एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसमें कोर्ट ने वसीयत लिखने वाले की व्यक्तिगत इच्छा को सबसे अहम माना है।

