
बिहार सरकार ने एक बार फिर से प्रशासनिक स्तर पर बड़ा फेरबदल किया है। राज्य में बड़े पैमाने पर आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए हैं, जिसमें सबसे चर्चित नाम बिहार कैडर के 1997 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस का है। लंबे समय से निलंबन की जंजीरों में जकड़े संजीव हंस का निलंबन आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया है और उन्हें राजस्व परिषद में अपर सचिव के महत्वपूर्ण पद पर पदस्थापित किया गया है। यह नियुक्ति तब हुई है जब पटना उच्च न्यायालय ने हाल ही में उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत प्रदान की थी, जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है।
संजीव हंस पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग के साथ-साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगे हुए हैं। ये आरोप मुख्य रूप से उनके ऊर्जा विभाग में प्रिंसिपल सेक्रेटरी और बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड (बीएसपीएचसीएल) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) रहते हुए की गई कारगुजारियों से जुड़े हैं। हंस का कार्यकाल 27 जुलाई 2020 से 1 अगस्त 2024 तक रहा, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर करीबी सहयोगियों के माध्यम से भ्रष्टाचार के जाल बुनने का काम किया। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया कि स्मार्ट मीटर लगाने के दो बड़े अनुबंध—997 करोड़ रुपये और 2850 करोड़ रुपये के—जीनस पावर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को दिए गए। इन अनुबंधों में कथित रूप से 123 करोड़ रुपये की रिश्वत का लेन-देन हुआ, जो शैडो कंपनियों के जरिए लेयरिंग और लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया से गुजरा।
ईडी की जांच के केंद्र में पवन धूत की धूत इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड भी है, जिसमें 60 करोड़ रुपये ट्रांसफर हुए। इनमें से 29 करोड़ रुपये पुष्पराज बजाज की प्रेरणा स्मार्ट सॉल्यूशन को हस्तांतरित कर दिए गए। यह पूरा लेन-देन अवैध माना गया है, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा। जांच की शुरुआत रूपासपुर पुलिस स्टेशन के केस नंबर 18/2023 से हुई, जिसमें आईपीसी की धाराओं 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 341 (गलत तरीके से रोकना), 376 (बलात्कार), 376डी (समूह बलात्कार), 420 (धोखाधड़ी), 313 (गर्भपात कराना), 120बी (आपराधिक साजिश), 504 (उकसाना), 506 (धमकी) और 34 (साझा इरादा) के तहत आरोप लगाए गए थे।
इसके बाद ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 3 और 4 के उल्लंघन के आधार पर ईसीआईआर नंबर पीटीजेडओ/04/2024 दर्ज किया, जो 14 मार्च 2024 को शुरू हुआ। जांच के दौरान भ्रष्टाचार के अतिरिक्त सबूत मिलने पर 28 अगस्त 2024 को बिहार की विशेष सतर्कता इकाई को सूचित किया गया। 14 सितंबर 2024 को एफआईआर नंबर 5/2024 दर्ज हुई, जिसमें संजीव हंस समेत 14 लोगों को नामजद किया गया। निचली अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद हंस ने पटना उच्च न्यायालय का रुख किया। न्यायाधीश चंद्र प्रकाश सिंह की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया, जिससे हंस को राहत मिली।
संजीव हंस की नियुक्ति राजस्व परिषद जैसे संवेदनशील विभाग में होने से आलोचना बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला बिहार की नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को उजागर करता है।

